खबरसार

लोक संस्कृति का पुरोधा जुगल किशोर पेटशाली को निधन

देश-दुन्या मा उत्तराखंड की संस्कृति तैं दिलै नै पछ्याण

सूण ल्यो

उत्तराखंडै लोक संस्कृति, नाट्य कला अर लोक परम्पराओं का मर्मज्ञ अर उत्तराखंड की संस्कृति तै नई पछ्याण दिलाण वळा जुगल किशोर पेटशाली जी को निधन ह्वेगे।

जुगल किशोर पेटशाली को जन्म 7 सितंबर 1947 खुणि अल्मोड़ा मा चितई गाँव मा ह्वे छौ। बाळापन बटि हि वो  पहाड़ै लोककला, परंपराओं अर लोक संगीत मा खूब रूचि ल्हेंद छया। औपचारिक पढ़ै-लिखै नि होण का बावजूद बि वूंन स्वाध्याय अर लोक परंपराओं तैं सीखिक अपणि रचनात्मक जातरा शुरू करे।

जुगल किशोर पेटशाली जीन् कुमाऊंनी लोककथाओं अर ऐतिहासिक गाथाओं तैं अजगालै दुन्या हिसाब से प्रस्तुत करे। वूंकी प्रसिद्ध नाट्य कृतियों मा राजुला–मालूशाही – प्रेम और संघर्ष की गाथा, बाला गोरिया – षड्यंत्र और पीड़ा की कहानी, अजुवा–बफौल – वीरता और समर्पण का चित्रण, नौ–लखा दीवान – अन्याय के विरोध और जनसंघर्ष की दास्तां शामिल छन।

येका अलावा वून् “जी रया जागि रया” (कुमाऊंनी कविता संग्रह), “विभूति योग” (गीता भावानुवाद), “गंगनाथ-गीतावली” (संपादन), “हे राम” जनि कई खास रचना करीन्। वूंका नाटकों पर आधारित धारावाहिक राजुला–मालूशाई दूरदर्शन पर बि प्रसारित ह्वे।

लोक संस्कृति का संरक्षण का वास्ता जुगल किशोर पेटशाली जीन् केवल लिखित अर मंचीय माध्यम से ही ना बल्कि सांस्कृतिक धरोहर तैं सैज-समाळिक बि लोक संस्कृति तै बचौण को काम करे।

2003 मा चितई, अल्मोड़ा मा लोक-संस्कृति संग्रहालय बणै जैमा 70 से जादा चित्र, 30 पारंपरिक वाद्य यंत्र, पुरणा भॉंडा-बर्तन, ग्रामोफोन, पांडुलिपि अर हौरि बि दुर्लभ चीज-बस्ती शामिल छई।

तबियत ठिक नि होण का वजै से बाद मा यो संग्रह वूंन दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र तैं दे दिने, जख आज यो “जुगल किशोर पेटशाली संग्रह” का नौ से संरक्षित छ।

संगीत नाटक अकादमी अमृत पुरस्कार (2023) – भारतीय उपराष्ट्रपति द्वारा प्रदर्शन कला अर लोक संस्कृति संरक्षण का वास्ता वूंतै पुरस्कृत बि करेगे।

कुमाऊं गौरव पुरस्कार, वरिष्ठ संस्कृति कर्मी पुरस्कार (उत्तराखंड सरकार), जय शंकर प्रसाद पुरस्कार, सुमित्रानंदन पंत पुरस्कार जना कतनै राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय सम्मान बि वूंतै मिलिने।

पेटशाली जी का प्रयासों से उत्तराखंड की लोककथाओं, लोकवाद्यों अर परंपराओं तै नई पहचान मिले। वूंन लोक कला तै सिर्फ समाळि नी छ, बल्कि वेतैं आणवळि पीढ़ी का वास्ता सुरक्षित बि करि।

वूंको रचनाकर्म आज बि उत्तराखंड का समाज तै अपणा जलड़ौं से जोड़णौ काम कर्नू छ।

वूंको यीं दुन्या से जाणौ उत्तराखंड की लोक संस्कृति का वास्ता एक भौत बड़ो नुकसान छ।

 

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