‘हवै जाज सी उड़दन सुख’
उत्तराखण्ड कि लोकभाषा - गढ़वाळि, कुमाऊँनी, जौनसारी तैं भि मुख्यधारा मा ल्हौण को प्रयास
दून पुस्तकालयम गढ़वालळि ग़ज़ल संग्रै ‘हवै जाज सी उड़दन सुख’को लोकार्पण।
देरादोंण, १९ सितम्बर २०२६ दून पुस्तकालय वा शोध केन्द्र, देरादोंणम आज सुबेरा सत्र को एक अलगि रंग देखणो मिलि। जै सभागारम गढ़वालळि भाषा की लय, पहाड़ का सुख- दुःख एक साथ गूंजणा रैनि।

मौका छयो वरिष्ठ कवि, संपादक अर रंगकर्मी मदनमोहन डुकलाण जी कि गढ़वळि ग़ज़ल संग्रै ‘हवैजाज सी उड़दन सुख’ का लोकार्पण को। यो उच्छप (उत्सव) खालि एक किताब/पुस्तक लोकार्पण को नि छयो, बल्कि विं भाषौ उत्सव छयो ज्व घरोंम बोले त जांदि, पर बड़ा मंचों पर आज बि अपणि जगा अपड़ु अधिकार खोजणि छ। दून पुस्तकालय को यना आयोजनों का पिछनै एक साफ(स्पष्ट) उद्देश्य रैंद। या संस्था अपणां संग्रै मा पाठकों का वास्ता खालि किताब नि रखदि, बल्कि सार्वजनिक परिवेशम स्वस्थ व सकारात्मक विमर्श अर संवाद तैं जगा देंण को भरसक प्रयास करदि। यह संस्था अपणां नियमित कार्यक्रमों की श्रंखला मा उत्तराखण्ड कि लोकभाषा – गढ़वाळि, कुमाऊँनी, जौनसारी तैं भि मुख्यधाराम ल्हौण को प्रयास करणि छ। संस्था को मकसद युवा पीढ़ी तैं अपड़ि जड़ों सि जोड़िकि रखणों अर क्षेत्रीय साहित्य तैं राष्ट्रीय पहचान दिलौणो को छ।
शनिवार को कार्यक्रम बि द्वी सत्रों मा बांट्यो छयो अर द्वी सत्रों न अपणों अपणों काम भौत भलि कै निभायी ।
पैलो सत्र : लोकार्पण और समीक्षा
पैला सत्रम पुस्तक को विधिवत लोकार्पण अर वे पर गैरायि सि परिचर्चा ह्वे। ये सत्रै अध्यक्षता कै हौरन ना बल्कि गढ़वाळि अस्मिता कि आवाज, प्रसिद्ध लोकगायक श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जीन करि। वूंकि उपस्थिति सभागारम एक अलग हि उर्जा अलगै रंग भोरणि छायि।

मुख्य मैमान का रूपम पूर्व पुलिस महानिदेशक अर वरिष्ठ साहित्यकार श्री अनिल रतूड़ी मौजूद रैनि।
विशिष्ट मैमानों कि उपस्थितिन मंच तैं हौरि गरिमामय बणै दिनि। जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण जिकि उपस्थिति लोक अर साहित्य का बिचम पुळ कि तरौं दिखे त ‘धाद’ पत्रिका का संपादक व ह.न.ब. गढ़वाल विश्वविद्यालय, श्रीनगरम लोककला एवं संस्कृति निष्पादन केन्द्र का निदेशक श्री गणेश खुगशाल ‘गणी’ जिन अकादमिक दृष्टि से ये संग्रै का महत्व को रेखांकन करि।
वरिष्ठ साहित्यकार व समीक्षक डॉ. जगदम्बा प्रसाद कोटनाला जिन समीक्षक का रुपम पुस्तक कि सारगर्भित(मुख्य बात अर्थ सहित) समीक्षा बतायि। वून बोलि कि ‘हवैजाज सी उड़दन सुख’ शीर्षक ही अपड़ा आपम एक पूरु दर्शन छ।
मदनमोहन डुकलाण जीन अपणी लेखन जात्रा का बारा मा बतैक बोलि कि ग़ज़ल लिखणो/बोलणों वूंका वास्ता खालि छंद कि तैयारी या अभ्यास नि छ, बल्कि अपणा गौं, अपणा बचपन अर विस्थापन कि पिड़ा बतौंण को तरिका छ।
सत्र को कुशल संचालन वरिष्ठ साहित्यकार अर शिक्षक गिरीश सुन्दरियाल जी करेगे।
दूसरो सत्र : ‘ग़ज़ल गुमणाट’ – जैमा ग़ज़ल गाये गैन
ये सत्रम संग्रै कि कुछ छंटि ग़ज़लों तैं प्रसिद्ध गायकोंन अपणि आवाज दिनि। अध्यक्षता करदा श्री नरेन्द्र सिंह नेगी जी न ‘आन्दि जान्दि सांस छै तू’ गैकि पूरा सभागार तैं घड़ेक बांध सि दिनि। डॉ. कुसुम भट्ट जीन ‘जंदरी सि रिटणी रैंद, नाज सि पिसेणी रैंद’ कि हिरदै छूंण वळि प्रस्तुति दिनि। गिरीश सुन्दरियाल जीन जब ‘लासों मा पहाड़ का बीजिगे बुरांस आज’ गायी त प्रवासी पहाड़ियों का आँख्योंम आंंसू ऐगेन। संगीता ढौंडियाल जीन ‘आज डाल्यों मूड़ि छैल नि रैगे’ आलोक मलासी जीन ‘कबि घाम छन, कबि छैल छन’ अर किशन महिपाल जीन ‘आँख्यों मा स्वीणा खीण दे, मैं तैं सुनिन्द सीण दे’ गैकि गढ़वळि ग़ज़ल तैं एक बड़ो रुप एक आकार दिनि।
यिं संगीतमयि संध्या का संगीतकार हारमोनियम पर आलोक मलासी जी, तबला पर त्रिष्ठव बडोनी अर गिटार पर सोनू वर्मा जीन संगत दिनि। ये दौरान सत्र को संचालन गढ़वळि साहित्यकार व शिक्षक धर्मेन्द्र नेगी जीन किरि।
कुल मिलैकि यो आयोजन, बोली – भाषा अर संवाद का खातिर भौत अच्छो मंच/माध्यम बणिक सामणि आयि।
यांका वास्ता “दून पुस्तकालय वा शोध केन्द्र” देरादोंण को भौत धन्यवाद, आभार।