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गढ़वाळि भाषा मानकीकरण अर व्याकरण पर कार्यशाला 

साहित्यकार, भाषाविदों का बीच ह्वे गढवाळि भाषा मानकीकरण को मंथन

सूण ल्यो

पौड़ी: २ अर ३ अक्टूबरो पौड़ी घुड़दौड़ी मा आनंद हिमालया रिजॉर्टम आयोजित  गढ़वाळि भाषा का मानकीकरण अर व्याकरण पर उर्यांई  कार्यशाला मा विद्वान वक्तौंन कारक, विभक्ति, परिसर्ग अर क्रियापद पर गंभीर चर्चा करि। भाषा तैं मानकभाषा कि तरफां ल्हिजाणै जर्वत छ। मानक भाषा का वास्ता अपणि भाषा तैं ल्हेकि जु स्थानीय लोभ छ स्यु त्यागण पड़लो तभि हम भाषा तैं मानक भाषा का बाटा पर अगनै ल्हिजै सकदां।

ईं कार्यशाला का मुख्य अतिथि प्रसिद्ध लोकगायक अर गीतकार नरेन्द्र सिंह नेगी जीन बोलि कि भाषा मा समै का दगड़ि अफ्वी बदलौ औणों रौंद, व लोक की जर्वतौं का हिसाब से बि ढळि जांद, हमारी पीढ़ि कि बड़ी जिम्मेदारी छ कि ईं भाषा को सैंतो सम्हाळ करिक अपणा बादै पीढ़ि का सुपुर्द करौं। विरासत जमीन जैदाद हि नि होंदि बलकन भाषा भि हमारि विरासत छ, वा भि एक पीढ़ि बिटि हैंकि पीढ़ि मा पौंछी चयेणी छ। कार्यशाला कि जर्वत पर वूंन बोलि कि भाषै बि समै-समै पर घर कूड़ों कि चार मरमत होंयीं चैंणी छ।

वूंन बोलि उत्तराखंड बणण का बाद गढ़वाळि पर अच्छो काम होंणों छ। नया साहित्यकार कहानी, कविता, नाटक समेत सबि विधाओं पर अच्छो काम कना छन। जो यिं भाषा का पक्ष मा फैदामंद छ। हम पुराणा साहित्यकार, अबोधबंधु बहुगुणा, कन्हैयालाल डंडरियाल जि जना बिद्वान लोखुं का आभारी छां।

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय कि हिंदी कि आचार्य प्रो गुड्डी बिष्ट पंवार जी न बोलि कि विश्वविद्यालय मा गढ़वाळि पर बि अच्छो काम होणो छ। आजकला विद्यार्थी अपणि लोक भाषाऽ प्रति गैरि रुचि लेंणा छन।

कार्यशाला मा गिरीश सुंदरियाल जीन गढ़वळि भाषाऽ व्याकरण कि बरीक जाणकरि देनि। गढ़वाळा कथगैयि इलाकोंम अलग-अलग बनि गढ़वाळि बोले जांद। साहित्य का खातिर यांको मानकीकरण जरुरि छ। कवि देवेंद्र जोशी जीन बोलि कि गढ़वळि को समृद्ध साहित्य छ, ज्व कै बि भाषा का भविष्यै कि पैलि करार छ। दिल्ली, मुंबई जना शैरों मा हमारा प्रवासी गढ़वाळि भाष मा रुचि हि नि ल्हेणा छन बल्कि विंतैं व्यवहारम बि ल्हाणा छन। गढ़वाळि कि मिठास अर मयळुपन कैं बि भाषा बोलण वाळा तैं मोहित कैर देंद।

जगदंबा प्रसाद कोटनाला जीन कवितम बिंब, प्रतीक अर भावों को महत्त्व बतैक बोलि कि काव्यम नयां शब्दों को बि इस्तेमाल होंण चैंणो छ, पर वु सब्द सब्यों कि समझ मा औंण वाळा होयां चैंदन। साहित्यकार मदन डुकलान जीन गढ़वळि कविता का इतिहास पर बात रखि अर कविता मा भाव को महत्त्व समझै। साहित्यकार महेशानन्द जी न गढ़वाळि का क्रिया पदु पर चर्चा करि। डॉ दर्शन सिंह नेगी जी न लोक साहित्य, कुलानन्द घनशाला जी न नाटक अर लोक नाट्य पर चर्चा करि। बलबीर राणा “अडिग”  न गढ़वाळि कानि पर अपणि बात रखि।

संचालन करदा गणेश खुगशाल “गणी” न बोले कि गढ़वाळि का मानकीकरण कि आज सगत जर्वत छ। यिं दिशा मा कुछ संस्था काबिल काम कनि छन। कार्यशाला मा कव्यूं अपणि कवितौं को पाठ भि करि।

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